पवन कुमार चंदना: असफलता से सफलता तक का सफर
जीवन में सफलता पाने के लिए क्या हमेशा स्कूल में टॉप करना जरूरी है? स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) के को-फाउंडर पवन कुमार चंदना की कहानी इस सवाल का जवाब ‘नहीं’ में देती है। हाल ही में NDTV को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने अपनी जिंदगी का एक ऐसा पहलू साझा किया, जिसे सुनकर हर कोई दंग रह गया। आज जो व्यक्ति भारत के पहले निजी रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजने में सफल रहा है, वह कभी गणित (Maths) विषय में संघर्ष करता था।
गणित में मिले थे सिर्फ 51 नंबर
पवन कुमार चंदना ने खुलासा किया कि स्कूल के दिनों में वे एक ‘औसत’ या कहें कि ‘खराब’ छात्र माने जाते थे। एक बार गणित के परीक्षा में उन्हें केवल 51 अंक मिले थे। आज वही पवन रॉकेट साइंस की जटिलताओं को सुलझा रहे हैं और भारत के अंतरिक्ष स्टार्टअप इकोसिस्टम का चेहरा बन गए हैं। उन्होंने कहा, ‘मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि मैं रॉकेट बनाऊंगा।’
ISRO का सपना और स्काईरूट की शुरुआत
अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, पवन ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में काम किया। वहाँ से मिली सीख और अनुभव ने उन्हें कुछ नया करने के लिए प्रेरित किया। 2018 में उन्होंने भरत ढाका के साथ मिलकर ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ की नींव रखी। उनका लक्ष्य था अंतरिक्ष तक पहुंच को आसान और किफायती बनाना। 2022 में स्काईरूट ने ‘विक्रम-S’ रॉकेट लॉन्च करके इतिहास रच दिया, जो भारत का पहला निजी तौर पर विकसित रॉकेट था।
युवाओं के लिए प्रेरणा
पवन की कहानी साबित करती है कि अकादमिक अंक आपकी क्षमता का पैमाना नहीं होते। उन्होंने अपने संघर्षों और चुनौतियों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाया। आज उनकी कंपनी न केवल भारत के लिए बल्कि दुनिया भर के उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की दिशा में काम कर रही है। उनका संदेश स्पष्ट है: अगर आपमें दृढ़ संकल्प और सीखने की इच्छा है, तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
निष्कर्ष
स्काईरूट एयरोस्पेस की सफलता केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उस आत्मविश्वास की जीत है जो यह बताता है कि आज के ‘कमजोर’ छात्र कल के ‘महान’ वैज्ञानिक बन सकते हैं। पवन कुमार चंदना का सफर हर उस युवा के लिए सबक है जो अपनी छोटी-मोटी असफलताओं से निराश हो जाते हैं।
