भारत की Gen-Z: शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की मांग
हाल ही में ‘द इकोनॉमिस्ट’ की एक विस्तृत रिपोर्ट ने भारत की बदलती युवा पीढ़ी यानी Gen-Z पर प्रकाश डाला है। आज का भारतीय युवा केवल डिग्री पाने की दौड़ में शामिल नहीं है, बल्कि वह अपनी शिक्षा की गुणवत्ता और उससे मिलने वाले भविष्य को लेकर गंभीर और मुखर है। भारत में शिक्षा प्रणाली को लेकर विरोध और असंतोष अब केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं, बल्कि सड़कों और सोशल मीडिया तक पहुंच गया है।
परंपरागत शिक्षा बनाम आधुनिक जरूरतें
भारत में दशकों से रटंत विद्या और डिग्री पर केंद्रित शिक्षा व्यवस्था का बोलबाला रहा है। हालांकि, आज की Gen-Z ने यह महसूस किया है कि किताबी ज्ञान उन्हें आधुनिक वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए पर्याप्त नहीं बना रहा है। द इकोनॉमिस्ट के अनुसार, युवा पीढ़ी का तर्क है कि कॉलेज से निकलने के बाद भी उनके पास उन कौशलों (Skills) की कमी है, जिनकी आज की कंपनियों को तलाश है।
क्यों आंदोलित है युवा पीढ़ी?
युवाओं के विरोध के पीछे मुख्य कारण बेरोजगारी और शिक्षा का बढ़ता खर्च है। भारत में लाखों छात्र हर साल ग्रेजुएशन पूरा करते हैं, लेकिन उनमें से एक बड़ा हिस्सा ‘रोजगार के अयोग्य’ (Unemployable) पाया जाता है। Gen-Z अब निम्नलिखित बदलावों की मांग कर रही है:
- कौशल-आधारित पाठ्यक्रम: केवल थ्योरी नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल लर्निंग पर जोर।
- रोजगार का सीधा संबंध: डिग्री का मतलब नौकरी की गारंटी होनी चाहिए।
- व्यवस्था में पारदर्शिता: भर्ती परीक्षाओं में देरी और धांधली के खिलाफ सख्त रुख।
क्या सरकार बदल रही है अपना रुख?
सरकार ने नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के जरिए कुछ सुधारों की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य शिक्षा को अधिक लचीला और कौशल-उन्मुख बनाना है। हालांकि, Gen-Z का मानना है कि इन सुधारों का क्रियान्वयन अभी भी बहुत धीमा है। युवा अब सरकार से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं और डिजिटल माध्यमों का उपयोग अपनी आवाज बुलंद करने के लिए कर रहे हैं।
निष्कर्ष
भारत की Gen-Z अब एक जागृत शक्ति है। उनका शिक्षा सुधार के लिए संघर्ष केवल एक आंदोलन नहीं है, बल्कि यह भविष्य की अर्थव्यवस्था को बचाने की एक कोशिश है। यदि भारत को ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (जनसांख्यिकीय लाभांश) का लाभ उठाना है, तो उसे अपने युवाओं की इस वाजिब मांग को गंभीरता से सुनना होगा।
