दिल्ली हाई कोर्ट में जंतर-मंतर इंटरनेट शटडाउन को लेकर चुनौती
हाल ही में दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर और उसके आसपास के क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाओं को बार-बार बंद किए जाने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। इस संबंध में दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें प्रशासन द्वारा लगाए जाने वाले इंटरनेट शटडाउन की संवैधानिकता और आवश्यकता पर सवाल उठाए गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
जंतर-मंतर देश का एक प्रमुख विरोध प्रदर्शन स्थल है। अक्सर यहां विभिन्न संगठनों द्वारा विरोध-प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं। सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस द्वारा कई बार इन इलाकों में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को अस्थाई रूप से बंद कर दिया जाता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इंटरनेट अब एक मौलिक अधिकार बन चुका है, और बिना किसी ठोस कारण या आपातकालीन स्थिति के इसे बंद करना नागरिकों के अधिकारों का हनन है।
याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क
याचिका में ‘बार एंड बेंच’ के रिपोर्टिंग के अनुसार, निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया गया है:
- मौलिक अधिकार: इंटरनेट तक पहुंच को सुप्रीम कोर्ट ने ‘अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ’ मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा माना है।
- अनावश्यक प्रतिबंध: याचिका में कहा गया है कि इंटरनेट बंद करने का आदेश मनमाना है और इससे न केवल प्रदर्शनकारियों बल्कि स्थानीय निवासियों, दुकानदारों और कामगारों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
- पारदर्शिता का अभाव: इंटरनेट बंद करने के आदेश जारी करते समय प्रक्रियात्मक नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है।
प्रशासन और कानून की स्थिति
दूसरी ओर, सुरक्षा एजेंसियां अक्सर ‘टेलीकॉम सस्पेंशन रूल्स, 2017’ का हवाला देती हैं। इन नियमों के तहत, सार्वजनिक सुरक्षा और लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर सकती है। हालांकि, कोर्ट का रुख हमेशा यह रहा है कि ऐसे प्रतिबंध केवल तभी लगाए जाने चाहिए जब ‘अत्यंत आवश्यक’ हो और वे ‘आनुपातिक’ (Proportional) हों।
आगे की राह
दिल्ली हाई कोर्ट अब इस मामले की सुनवाई कर रहा है। देखना यह होगा कि कोर्ट सरकार से इंटरनेट निलंबन के आदेशों के पीछे के डेटा और आधार की मांग करता है या नहीं। यह फैसला भविष्य के लिए एक मिसाल बन सकता है कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान डिजिटल अधिकारों का संतुलन कैसे बनाया जाए।
यह मामला न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश में ‘इंटरनेट शटडाउन’ की नीति पर बहस को फिर से जिंदा कर गया है। डिजिटल युग में, सूचना का अधिकार और सुरक्षा के बीच एक महीन रेखा होती है, जिसे पार करना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है।
