बाल विवाह से शिक्षा की ओर: एक संकल्प की कहानी
समाज में आज भी कई ऐसी कुरीतियां व्याप्त हैं जो प्रतिभाओं का गला घोंट देती हैं। ऐसी ही एक कुरीति है ‘बाल विवाह’, जिसने न जाने कितनी लड़कियों के सपनों को बचपन में ही खत्म कर दिया। लेकिन प्रिया (बदला हुआ नाम) की कहानी इन सब से जुदा है। बाल विवाह के बंधन में बंधने के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी और आज वह न केवल खुद शिक्षित हैं, बल्कि दूसरों के लिए शिक्षा की मशाल बन गई हैं।
शुरुआती संघर्ष और चुनौतियां
प्रिया का बचपन एक छोटे से गांव में बीता, जहां शिक्षा से ज्यादा लड़कियों की शादी पर जोर दिया जाता था। बहुत ही कम उम्र में उनकी शादी करवा दी गई, जिससे उनका स्कूल जाने का सपना अधूरा रह गया। लेकिन, उनके मन में पढ़ने की जो लौ थी, वह कभी बुझी नहीं। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, उन्होंने अपने पति और ससुराल वालों को अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए राजी किया।
शिक्षा का महत्व और बदलाव
अपनी पढ़ाई के दौरान प्रिया ने महसूस किया कि शिक्षा ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जिससे समाज की कुरीतियों को जड़ से मिटाया जा सकता है। उन्होंने कड़ी मेहनत की और उच्च शिक्षा प्राप्त की। आज, वे न केवल खुद एक स्वतंत्र महिला हैं, बल्कि अपने क्षेत्र की अन्य लड़कियों को भी स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं।
मिशन: शिक्षा को सुलभ बनाना
प्रिया का मिशन अब स्पष्ट है—’हर हाथ में कलम’। उन्होंने अपने गांव और आसपास के क्षेत्रों में छोटे-छोटे शिक्षण केंद्र शुरू किए हैं। यहां वे उन लड़कियों और बच्चों को पढ़ाती हैं, जो आर्थिक तंगी या सामाजिक दबाव के कारण स्कूल नहीं जा पाते। उनका मानना है कि जब एक लड़की शिक्षित होती है, तो पूरा परिवार और समाज शिक्षित होता है।
निष्कर्ष
प्रिया की यह यात्रा हमें सिखाती है कि बाधाएं कितनी भी बड़ी क्यों न हों, यदि इरादे मजबूत हों, तो कोई भी मंजिल हासिल की जा सकती है। उनकी कहानी समाज के लिए एक दर्पण है, जो हमें यह याद दिलाती है कि बाल विवाह एक अभिशाप है, जिसे केवल शिक्षा के प्रकाश से ही दूर किया जा सकता है।
