पंजाब और हरियाणा की कृषि में यूपी-बिहार के योगदान की कहानी
भारत को ‘अन्नदाता’ बनाने में पंजाब और हरियाणा की भूमिका सर्वविदित है, लेकिन इस सफलता के पीछे छिपी असली ताकत उत्तर प्रदेश और बिहार के वे लाखों प्रवासी मजदूर हैं, जो हर मौसम में खेतों में पसीना बहाते हैं। यदि हम निष्पक्ष होकर देखें, तो पंजाब और हरियाणा की समृद्ध कृषि अर्थव्यवस्था यूपी और बिहार के श्रम पर टिकी है।
खेती की रीढ़: प्रवासी मजदूर
पंजाब और हरियाणा में ‘हरित क्रांति’ के बाद खेती का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। बड़े जोत और मशीनीकरण के बावजूद, धान की रोपाई, कटाई और अन्य श्रम-साध्य कार्यों के लिए मानव श्रम की आवश्यकता आज भी अनिवार्य है। स्थानीय किसान अक्सर इन कठिन कार्यों के लिए यूपी और बिहार के कुशल कामगारों पर निर्भर होते हैं।
आर्थिक संबंध और निर्भरता
पंजाब और हरियाणा के खेतों में काम करने वाले ये मजदूर न केवल अपनी आजीविका कमाते हैं, बल्कि वे इन राज्यों की जीडीपी में भी बड़ा योगदान देते हैं। यह एक ऐसा पारस्परिक संबंध है जहाँ एक तरफ इन राज्यों को सस्ता और कुशल श्रम मिलता है, वहीं दूसरी तरफ यूपी और बिहार के परिवारों को आर्थिक संबल प्राप्त होता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इन राज्यों की कृषि लागत काफी हद तक इन श्रमिकों की उपलब्धता और उनके वेतन पर निर्भर करती है।
श्रम लागत का महत्व
कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इन प्रवासी श्रमिकों का प्रवाह रुक जाए, तो पंजाब और हरियाणा के कृषि कार्य ठप हो सकते हैं। हाल के वर्षों में श्रम की कमी और मजदूरी में बढ़ोतरी ने उत्पादन लागत को प्रभावित किया है। इन राज्यों को न केवल उत्पादकता बढ़ाने पर, बल्कि इन श्रमिकों के कल्याण और सामाजिक सुरक्षा के प्रति भी एक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा ताकि यह ‘कृषि गठबंधन’ बना रहे।
निष्कर्ष
भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में उत्तर प्रदेश और बिहार के श्रमिकों का योगदान किसी भी बड़ी मशीनरी से कम नहीं है। यह समय है कि हम न केवल पंजाब और हरियाणा की तकनीक की सराहना करें, बल्कि उन हाथों का भी सम्मान करें जो इन राज्यों की मिट्टी में दिन-रात मेहनत करते हैं।
