22/07/2026

लद्दाख के लिए जारी संघर्ष: सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और CJP का दखल

लद्दाख के जाने-माने पर्यावरण कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक इन दिनों अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल को लेकर सुर्खियों में हैं। लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी और वहां की विशिष्ट संस्कृति की रक्षा के लिए वे केंद्र सरकार से संवैधानिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। हाल ही में, ‘सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ (CJP) ने वांगचुक से अपनी भूख हड़ताल समाप्त करने का आग्रह किया है, साथ ही यह वादा किया है कि इस आंदोलन को देशभर में व्यापक समर्थन के साथ आगे बढ़ाया जाएगा।

क्या है सोनम वांगचुक की मांग?

सोनम वांगचुक का मुख्य जोर लद्दाख को भारतीय संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के तहत शामिल करने पर है। उनका तर्क है कि लद्दाख जैसे संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्र में औद्योगिक विकास और अनियंत्रित खनन गतिविधियों से पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंच रही है। स्थानीय लोगों के अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए वे लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और विशेष संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने की वकालत कर रहे हैं।

CJP का समर्थन और अपील

CJP ने एक बयान जारी करते हुए सोनम वांगचुक के साहस और उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों की सराहना की है। संस्था का कहना है, “सोनम वांगचुक का संघर्ष केवल लद्दाख का नहीं, बल्कि पूरे देश के पर्यावरण और मानवाधिकारों का है। हम उनसे आग्रह करते हैं कि वे अपना स्वास्थ्य बचाएं और भूख हड़ताल समाप्त करें। हम आश्वासन देते हैं कि इस आंदोलन की लौ बुझने नहीं दी जाएगी और हम इसे सामूहिक रूप से आगे ले जाएंगे।”

लद्दाख में जारी विरोध प्रदर्शन

वांगचुक के समर्थन में लद्दाख के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। छात्र, महिलाएं, और बुजुर्ग भारी ठंड के बावजूद सड़कों पर उतरकर अपनी मांगों को दोहरा रहे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि लद्दाख को विशेष दर्जा नहीं मिला, तो यहां की जमीन और संसाधनों पर बाहरी लोगों का कब्जा हो जाएगा, जिससे क्षेत्र की डेमोग्राफी बदल सकती है।

आगे की राह

भले ही सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल ने सरकार का ध्यान खींचा है, लेकिन अभी तक सरकार की ओर से कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है। CJP और अन्य नागरिक समाज संगठनों का मानना है कि बातचीत का रास्ता ही एकमात्र विकल्प है। आने वाले दिनों में यह आंदोलन एक बड़े जन आंदोलन में तब्दील हो सकता है, क्योंकि देश के कई अन्य हिस्सों से भी पर्यावरणविदों ने लद्दाख का समर्थन करना शुरू कर दिया है।

यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या केंद्र सरकार लद्दाख की विशिष्ट भौगोलिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कोई बड़ा नीतिगत फैसला लेती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *