30/07/2026

डिजिटल हाइजीन और निजता: क्या हम एक असुरक्षित युग में जी रहे हैं?

आज के डिजिटल युग में, ‘डिजिटल हाइजीन’ (Digital Hygiene) का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। हालांकि, जेन-जेड (Gen Z), जो पूरी तरह से तकनीक के साथ बड़ा हुआ है, अक्सर अपनी डिजिटल सुरक्षा के प्रति लापरवाह पाया जाता है। वहीं दूसरी ओर, सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) जैसे संगठनों द्वारा सरकारी निगरानी और डेटा सुरक्षा को लेकर उठाए गए सवाल यह दर्शाते हैं कि स्थिति और भी गंभीर है।

जेन-जेड की डिजिटल लापरवाही: एक बड़ा जोखिम

जेन-जेड के लिए इंटरनेट सांस लेने जैसी जरूरत है, लेकिन इस पीढ़ी में साइबर सुरक्षा को लेकर जागरूकता की कमी चिंता का विषय है। कमजोर पासवर्ड का उपयोग, बिना सोचे-समझे किसी भी लिंक पर क्लिक करना, और सोशल मीडिया पर अपनी निजी जानकारी को सार्वजनिक करना आम बात है। यह डिजिटल हाइजीन में कमी न केवल उनके व्यक्तिगत डेटा को खतरे में डालती है, बल्कि उन्हें साइबर धोखाधड़ी का आसान शिकार भी बनाती है।

CJP का विरोध और सरकारी निगरानी: क्या सरकार ‘जेन-जेड’ से भी बदतर है?

जब हम व्यक्तिगत स्तर पर अपनी सुरक्षा में ढील बरतते हैं, तो सरकारें इसका फायदा उठाने में पीछे नहीं रहतीं। CJP (सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस) जैसे संगठनों ने बार-बार सरकारी निगरानी तकनीकों, जैसे कि पेगासस या अन्य स्पायवेयर के उपयोग पर सवाल उठाए हैं। यदि एक नागरिक अपनी डिजिटल सुरक्षा में चूक करता है, तो वह खुद को खतरे में डालता है, लेकिन जब सरकार नागरिकों की निगरानी के लिए अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करती है, तो यह पूरे लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाता है।

भारत में डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का तर्क है कि सरकार की ‘डिजिटल हाइजीन’ का अर्थ केवल राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं, बल्कि असहमति को दबाना भी हो गया है। सरकारी डेटाबेस और निगरानी तंत्र अक्सर बिना पर्याप्त न्यायिक निगरानी के संचालित होते हैं, जो नागरिकों की निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

समाधान की ओर: हम क्या कर सकते हैं?

डिजिटल सुरक्षा के लिए हमें दो स्तरों पर काम करना होगा:

  • व्यक्तिगत स्तर: जेन-जेड को ‘टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन’, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और मजबूत पासवर्ड मैनेजर के उपयोग को अपनी आदत बनाना होगा।
  • नीतिगत स्तर: नागरिक समाज को सरकार से डेटा संरक्षण कानूनों (Data Protection Laws) की मांग जारी रखनी होगी ताकि सरकारी निगरानी पर अंकुश लगाया जा सके।

निष्कर्ष यह है कि भले ही जेन-जेड अपनी डिजिटल आदतों को सुधारने में पीछे है, लेकिन सरकारी तंत्र द्वारा नागरिकों की डिजिटल निजता का अनादर करना कहीं अधिक खतरनाक है। डिजिटल सशक्तिकरण का अर्थ केवल तकनीक का उपयोग करना नहीं, बल्कि अपने अधिकारों की रक्षा करना भी है।

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