भारत-यूके राजनयिक संबंधों में नया मोड़: नीरव मोदी और अवैध प्रवासियों का कनेक्शन
हाल ही में पूर्व ब्रिटिश गृह सचिव सुएला ब्रेवरमैन ने एक बड़ा खुलासा करते हुए भारत और यूके के बीच कूटनीतिक तनाव पर एक नई बहस छेड़ दी है। ब्रेवरमैन के अनुसार, भारत ने यूके से अवैध रूप से रह रहे अपने नागरिकों को वापस लेने के प्रस्ताव को इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि ब्रिटेन भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी के प्रत्यर्पण में सहयोग नहीं कर रहा था। यह बयान दोनों देशों के बीच चल रहे प्रत्यर्पण और आव्रजन (इमिग्रेशन) के जटिल मुद्दों पर प्रकाश डालता है।
सुएला ब्रेवरमैन का दावा क्या है?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सुएला ब्रेवरमैन ने संकेत दिया कि जब वे गृह सचिव थीं, तब उन्होंने भारत के साथ प्रवासियों को वापस भेजने के लिए एक समझौता करने की कोशिश की थी। हालांकि, भारतीय अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया था कि वे इस प्रक्रिया में तब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाएंगे जब तक कि यूके सरकार नीरव मोदी जैसे आर्थिक अपराधियों के प्रत्यर्पण को लेकर गंभीर नहीं दिखती।
नीरव मोदी का मामला: एक बड़ी बाधा
नीरव मोदी, जो पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के करोड़ों रुपये के घोटाले में मुख्य आरोपी है, काफी समय से लंदन की जेल में बंद है। भारत लंबे समय से उसके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है। यूके की अदालतों ने प्रत्यर्पण के पक्ष में फैसला सुनाया है, लेकिन विभिन्न कानूनी दांव-पेंचों के कारण प्रक्रिया अभी भी पूरी नहीं हो पाई है। भारतीय पक्ष का मानना है कि यदि ब्रिटेन अपने देश में छिपे आर्थिक अपराधियों को वापस भेजने के मामले में सुस्त है, तो वे अवैध प्रवासियों को वापस लेने की प्रक्रिया को तेजी से आगे नहीं बढ़ा सकते।
कूटनीतिक गतिरोध और इसके प्रभाव
यह मामला भारत की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को दर्शाता है, जिसमें भारत सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि आर्थिक अपराधी जो देश का पैसा लेकर भागे हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर न्याय के दायरे में लाया जाएगा। विशेषज्ञ इसे ‘क्विड प्रो क्वो’ (Quid Pro Quo) की रणनीति के रूप में देख रहे हैं, जहाँ भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए दबाव की रणनीति अपना रहा है।
निष्कर्ष
ब्रिटेन और भारत के संबंध हमेशा से ही जटिल रहे हैं, विशेषकर आव्रजन और प्रत्यर्पण के मुद्दों पर। ब्रेवरमैन का यह बयान न केवल एक पुरानी कूटनीतिक बातचीत को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि भविष्य में व्यापार समझौतों (FTA) के अलावा, ये मुद्दे दोनों देशों के बीच संबंधों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
