22/07/2026

भूमिका: सत्ता और जनता के बीच का संघर्ष

हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ का नारा एक प्रमुख राजनीतिक विमर्श बन गया है। हालांकि, जब भी सरकार के सामने विरोध के स्वर उठते हैं, तो निपटने का तरीका अक्सर बातचीत के बजाय बल प्रयोग में बदल जाता है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ का संपादकीय लेख इसी विरोधाभास पर सवाल उठाता है कि क्या आंसू गैस और लाठियों के साये में वाकई जनता का विश्वास जीता जा सकता है?

लोकतंत्र में संवाद का महत्व

एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान वहां के नागरिक समाज और सरकार के बीच होने वाले स्वस्थ संवाद से होती है। जब किसान, छात्र या कोई अन्य वर्ग अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरता है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही हिस्सा है। लेकिन हालिया घटनाओं में जिस तरह से प्रदर्शनकारियों को ‘बाहरी’ या ‘राष्ट्रविरोधी’ करार देकर उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए और लाठियां बरसाई गईं, वह चिंताजनक है। हिंसा और दमन कभी भी जन-विश्वास का आधार नहीं बन सकते।

‘सबका विश्वास’ बनाम दमनकारी नीतियां

सरकार का ‘सबका विश्वास’ हासिल करने का दावा तब खोखला लगने लगता है जब नीतिगत विरोध को कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में पेश किया जाता है। जब तक सरकार असहमति के स्वरों को सुनने के बजाय उन्हें कुचलने की कोशिश करेगी, तब तक समाज में ध्रुवीकरण की खाई और गहरी होती जाएगी। लाठियां और बैरिकेड्स केवल अस्थायी रूप से विरोध को दबा सकते हैं, लेकिन वे उस अविश्वास को दूर नहीं कर सकते जो सरकारी नीतियों के प्रति लोगों के मन में पैदा हुआ है।

क्या विकल्प हो सकते हैं?

  • खुला संवाद: विरोध करने वाले समूहों के साथ बिना किसी पूर्वाग्रह के बातचीत करना।
  • सहिष्णुता: लोकतंत्र में असहमति को देशद्रोह नहीं, बल्कि सुधार का एक मौका माना जाना चाहिए।
  • पारदर्शिता: सरकारी नीतियों के निर्माण में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

अंतिम विश्लेषण में, विश्वास को बलपूर्वक आरोपित नहीं किया जा सकता। इसे अर्जित करना पड़ता है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ का यह रुख स्पष्ट करता है कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में शासन चलाने के लिए आंसू गैस नहीं, बल्कि करुणा और संवेदनशीलता की आवश्यकता है। यदि सरकार वाकई ‘सबका विश्वास’ जीतना चाहती है, तो उसे दमनकारी मशीनरी के बजाय लोक-कल्याणकारी संवाद की राह चुननी होगी।

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