23/07/2026

टोक्यो में नया ड्रेस कोड: क्या शॉर्ट्स पहनना है सही?

जापान की राजधानी टोक्यो हमेशा से अपनी कार्य संस्कृति और अनुशासन के लिए जानी जाती है। लेकिन हाल ही में टोक्यो प्रशासन द्वारा एक नया सुझाव दिया गया है, जिसने सोशल मीडिया और कार्यस्थलों पर एक नई बहस छेड़ दी है। प्रशासन ने भीषण गर्मी और बढ़ती उमस से निपटने के लिए पुरुषों को ऑफिस में ‘शॉर्ट्स’ पहनने की सलाह दी है। हालांकि, यह फैसला महिलाओं के लिए एक ‘लेग हेयर हरासमेंट’ (पैरों के बालों को लेकर उत्पीड़न) का विषय बन गया है।

क्या है पूरा मामला?

टोक्यो में गर्मी के महीनों के दौरान तापमान काफी बढ़ जाता है। कर्मचारियों को राहत देने के उद्देश्य से, प्रशासन ने ‘कूल बिज़’ (Cool Biz) अभियान के तहत पुरुषों को औपचारिक कपड़ों के बजाय आरामदायक कपड़े पहनने का सुझाव दिया है। इस पहल में घुटने तक के शॉर्ट्स भी शामिल हैं। प्रशासन का तर्क है कि इससे बिजली की खपत कम होगी क्योंकि एयर कंडीशनिंग का तापमान कम रखा जा सकेगा।

महिलाओं ने क्यों जताया विरोध?

इस फैसले के बाद महिलाओं का एक बड़ा वर्ग नाराज है। उनका कहना है कि यह एक प्रकार का दोहरा मापदंड है। सोशल मीडिया पर कई महिलाओं ने इसे ‘लेग हेयर हरासमेंट’ का नाम दिया है। उनका तर्क है कि अगर पुरुष ऑफिस में शॉर्ट्स पहनेंगे, तो उनके पैर के बाल सबको दिखेंगे, जो पेशेवर माहौल में असहज हो सकता है।

महिलाओं का कहना है, “हमसे तो हमेशा उम्मीद की जाती है कि हम अपने पैरों के बालों को शेव करें या हटाएँ, अन्यथा हमें अनप्रोफेशनल माना जाता है। लेकिन पुरुषों के लिए कोई ऐसी बाध्यता नहीं है। अगर वे शॉर्ट्स पहनेंगे और बाल नहीं हटाएंगे, तो क्या उसे भी ‘प्रोफेशनल’ माना जाएगा?” यह बहस सीधे तौर पर कार्यस्थल पर जेंडर के आधार पर होने वाले भेदभाव और सौंदर्य मानकों पर सवाल उठाती है।

कार्यस्थल की संस्कृति और आधुनिक चुनौतियां

यह घटना जापान की उस पुरानी कार्य संस्कृति पर सवाल खड़े करती है जहाँ पहनावे को अनुशासन से जोड़कर देखा जाता है। जहाँ पुरुष हमेशा से सूट-बूट में बंधे रहे हैं, वहीं महिलाओं पर हमेशा अधिक कड़े सामाजिक मानक थोपे गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रेस कोड को लचीला बनाना अच्छी बात है, लेकिन इसे लागू करते समय सामाजिक समानता का ध्यान रखना भी जरूरी है।

निष्कर्ष

टोक्यो की यह पहल चाहे पर्यावरण और कर्मचारियों के आराम के लिए ही क्यों न हो, लेकिन इसने एक गहरी सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है। कार्यस्थल में समानता का अर्थ केवल नीतियों का बदलाव नहीं, बल्कि उन मानदंडों को खत्म करना भी है जो जेंडर के आधार पर अलग-अलग व्यवहार को बढ़ावा देते हैं।

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