26/07/2026

Lurk Review: एम.ए. निषाद की फिल्म ‘लर्क’ – एक अनूठा सिनेमाई अनुभव

एम.ए. निषाद का नाम जब भी सिनेमा जगत में आता है, तो एक गंभीर और सामाजिक सरोकार वाली फिल्म की उम्मीद बंधती है। उनकी हालिया फिल्म ‘लर्क’ (Lurk) भी इससे अलग नहीं है। यह फिल्म महज जंगली जानवरों के हमलों की कहानी नहीं है, बल्कि यह इंसानी फितरत और समाज में छिपे हुए उन ‘जानवरों’ पर एक करारा प्रहार है, जो सभ्यता के मुखौटे के पीछे छिपे हैं।

कहानी का सार: जब प्रकृति और इंसान टकराते हैं

फिल्म की कहानी की शुरुआत डरावनी घटनाओं से होती है, जहाँ जानवरों के हमले आम हो जाते हैं। ‘लर्क’ का शाब्दिक अर्थ ही होता है ‘छिपकर घात लगाना’। फिल्म का शीर्षक यहाँ एक दोहरा अर्थ रखता है। एक तरफ जहाँ जंगली जानवर अपने प्राकृतिक आवास छिन जाने के कारण इंसान पर हमला कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इंसान भी एक-दूसरे पर घात लगाकर बैठा है। निर्देशक एम.ए. निषाद ने इन दोनों पहलुओं को बहुत ही खूबसूरती से बुना है।

निर्देशन और पटकथा

एम.ए. निषाद ने ‘लर्क’ के माध्यम से एक ऐसा नैरेटिव पेश किया है जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है। तकनीकी रूप से फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और सिनेमैटोग्राफी माहौल को डरावना और तनावपूर्ण बनाए रखती है। पटकथा में हालांकि कुछ जगहें धीमी लग सकती हैं, लेकिन फिल्म का मुख्य संदेश इतना प्रभावशाली है कि दर्शक अंत तक बंधे रहते हैं।

अभिनय का दम

फिल्म के कलाकारों ने अपने अभिनय से इसे और भी प्रभावशाली बना दिया है। मानवीय संवेदनाओं को जिस तरह से किरदारों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है, वह काबिल-ए-तारीफ है। मुख्य कलाकारों ने न केवल डर को बल्कि समाज के प्रति गुस्से और हताशा को भी बखूबी पर्दे पर उतारा है।

निष्कर्ष: क्या आपको यह फिल्म देखनी चाहिए?

अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो केवल मनोरंजन न करके समाज को आईना दिखाती हैं, तो ‘लर्क’ आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प है। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी ‘जंगली’ हम खुद होते हैं। लेंसमेन रिव्यू के अनुसार, ‘लर्क’ निस्संदेह एम.ए. निषाद के करियर की एक साहसी और अलग फिल्म है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *