भारत-चीन संबंधों में तनाव के बीच जयशंकर की दो-टूक बात
भारत और चीन के बीच राजनयिक संबंधों में चल रहे तनाव के बीच, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने चीनी समकक्ष वांग यी के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की। इस मुलाकात में जयशंकर ने व्यापार और आर्थिक मुद्दों पर भारत के हितों को मजबूती से रखा। उन्होंने मुख्य रूप से तीन बड़े बिंदुओं पर चीन का ध्यान आकर्षित किया, जो आने वाले समय में दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
1. व्यापार घाटे (Trade Gap) की बढ़ती चुनौती
भारत और चीन के बीच व्यापार असंतुलन लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत के लिए चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा एक बड़ी चिंता का विषय है। भारत का निर्यात चीन के मुकाबले काफी कम है, जिससे व्यापार संतुलन पूरी तरह से चीन के पक्ष में झुका हुआ है। विदेश मंत्री ने इस अंतर को कम करने के लिए चीन से ठोस कदम उठाने की मांग की है ताकि व्यापारिक संबंध अधिक संतुलित और टिकाऊ बन सकें।
2. भारतीय वस्तुओं के लिए मार्केट एक्सेस (Market Access)
चीन के बाजार तक भारतीय उत्पादों की पहुंच को लेकर अक्सर बाधाएं देखी गई हैं। वांग यी के साथ बातचीत में जयशंकर ने जोर दिया कि भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, कृषि उत्पादों और अन्य सेवाओं के लिए चीनी बाजार को खोलना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यदि चीन वास्तव में एक निष्पक्ष व्यापारिक वातावरण चाहता है, तो उसे गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाना होगा ताकि भारतीय कंपनियां चीन में अपनी जगह बना सकें।
3. सप्लाई चेन (Supply Chain) में स्थिरता और भरोसा
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) में चीन का वर्चस्व है, लेकिन कोविड-19 के बाद दुनिया ‘चीन प्लस वन’ रणनीति पर काम कर रही है। जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि भविष्य की सप्लाई चेन न केवल कुशल होनी चाहिए, बल्कि उसमें भरोसा और पारदर्शिता भी होनी चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि भारत एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभर रहा है और आपूर्ति श्रृंखला में चीन के एकाधिकार को कम करने के लिए भारत की भागीदारी महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
विदेश मंत्री जयशंकर का यह कड़ा रुख दर्शाता है कि भारत अब आर्थिक मामलों में किसी भी प्रकार का समझौता करने के मूड में नहीं है। चीन के साथ सीमा विवादों के अलावा, व्यापारिक मोर्चे पर भारत अब अपनी शर्तों पर बात करना चाहता है। यह बैठक स्पष्ट करती है कि नई दिल्ली और बीजिंग के बीच आर्थिक संबंधों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि चीन भारत की इन जायज चिंताओं को किस तरह से संबोधित करता है।
