जापान में शिक्षा संकट और कामकाजी माताओं पर बढ़ता दबाव
जापान में ‘फ्यूटोको’ (Futoko) यानी बच्चों का स्कूल जाने से इनकार करना एक गंभीर सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है। हाल ही में ‘माइनिची शिंबुन’ (Mainichi Shimbun) द्वारा प्रकाशित एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने इस समस्या के एक और गहरे पहलू को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों के स्कूल न जाने की स्थिति में माताओं के अपनी नौकरी छोड़ने की संभावना पिताओं की तुलना में 30 गुना अधिक है।
क्या कहता है सर्वे?
यह डेटा जापान में जेंडर रूढ़िवादिता और परवरिश की जिम्मेदारी में भारी असमानता को दर्शाता है। सर्वे में पाया गया कि जब बच्चा स्कूल जाना बंद कर देता है, तो घर के प्रबंधन और बच्चे की मानसिक स्थिति को संभालने का पूरा बोझ मां पर आ जाता है। सामाजिक उम्मीदों के चलते, कामकाजी माताओं के पास अपनी करियर से समझौता करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
जापान में कार्यस्थल की संस्कृति अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है, जहां लचीलेपन की बहुत कमी है। जब बच्चा स्कूल नहीं जाता, तो उसे घर पर अकेला नहीं छोड़ा जा सकता, और ऐसी स्थिति में पिता की तुलना में माताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने करियर को प्राथमिकता न दें। यह न केवल माताओं के करियर को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि जापान की अर्थव्यवस्था में श्रम शक्ति की कमी की समस्या को भी बढ़ाता है।
क्यों माताओं को ही उठाना पड़ता है कदम?
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं:
- पारंपरिक जेंडर भूमिकाएं: जापान में अभी भी ‘पुरुष बाहर कमाएंगे और महिलाएं घर संभालेंगी’ वाली मानसिकता का गहरा प्रभाव है।
- कार्यस्थल का लचीलापन: पुरुषों के लिए अपने कार्य घंटों में कटौती करना या छुट्टी लेना सामाजिक और कॉर्पोरेट स्तर पर अभी भी कठिन माना जाता है।
- मानसिक स्वास्थ्य का दबाव: स्कूल न जाने वाले बच्चों की देखभाल के लिए लगातार ध्यान और भावनात्मक समर्थन की आवश्यकता होती है, जो मुख्य रूप से माताओं पर डाल दिया जाता है।
निष्कर्ष
यह रिपोर्ट इस बात की ओर इशारा करती है कि जापान को केवल स्कूल रिफ्यूजल की समस्या का समाधान नहीं करना है, बल्कि अपने कार्यस्थलों में लैंगिक समानता और लचीलापन भी लाना होगा। जब तक पिताओं को भी परवरिश की उतनी ही जिम्मेदारी लेने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाएगा, तब तक माताओं पर यह बोझ बना रहेगा।
