सुप्रीम कोर्ट में फेशियल रिकग्निशन और बायोमेट्रिक निगरानी पर बहस
हाल ही में, एक सांसद ने सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की है, जो भारत में सार्वजनिक स्थानों पर ‘फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी’ (FRT) और बायोमेट्रिक निगरानी के बढ़ते उपयोग पर सवाल उठाती है। यह मामला ‘लाइव लॉ’ (Live Law) द्वारा रिपोर्ट किया गया है और यह व्यक्तिगत निजता (Right to Privacy) और राज्य की सुरक्षा व्यवस्था के बीच एक नई बहस को जन्म देता है।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता का तर्क है कि बिना किसी स्पष्ट कानूनी ढांचे (Legislative Framework) के सरकार द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे की पहचान वाली तकनीक का उपयोग करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। याचिका में कहा गया है कि व्यापक स्तर पर बायोमेट्रिक डेटा का संग्रह नागरिकों को ‘सतत निगरानी’ (Mass Surveillance) के दायरे में लाता है, जिससे उनके स्वतंत्र रूप से चलने और अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
तकनीकी निगरानी और निजता का अधिकार
केएस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। याचिकाकर्ता का दावा है कि फेशियल रिकग्निशन तकनीक का अंधाधुंध उपयोग इस अधिकार को कमजोर करता है। मुख्य चिंताएं निम्नलिखित हैं:
- डेटा सुरक्षा: एकत्र किए गए बायोमेट्रिक डेटा का गलत उपयोग या लीक होने का जोखिम।
- अनुपातहीनता (Proportionality): क्या अपराध रोकने के नाम पर पूरे समाज की जासूसी करना उचित है?
- कानूनी अस्पष्टता: भारत में वर्तमान में कोई विशिष्ट कानून नहीं है जो डेटा के उपयोग को सख्ती से विनियमित करता हो।
सरकारी तर्क और सुरक्षा का पक्ष
दूसरी ओर, सरकारी एजेंसियां अक्सर तर्क देती हैं कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने, अपराधियों की पहचान करने और खोए हुए बच्चों को खोजने के लिए यह तकनीक अनिवार्य है। सरकार का मानना है कि तकनीक का उपयोग अपराध को कम करने में मददगार साबित हो रहा है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का रुख इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। यदि अदालत इस तकनीक के उपयोग पर दिशा-निर्देश जारी करती है, तो यह भारत में डेटा सुरक्षा और सर्विलांस पॉलिसी के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। नागरिकों के लिए यह समझना जरूरी है कि तकनीक का लाभ उठाते समय उनकी निजता का हनन न हो।
